दस्तक
पुत्र है तू उसी नारी का कैसा पाप का घडा रचाया जो मरघट भी है रो पडा। शर्म से झुकी चिता की आग चित्रगुप्त भी आज विचलित खडा। !!१ !! किया अभद्र रावण ने तो सदियों से पुतला जलता रहा। आजके यह दुष्ट नराधम जननी का अंग हरता रहा। !!२ !! दिखा रहे है नारी पर ऎसी कठोरता मानव है तू कोई जानवर तो नहीं नारी है तू सृष्टि रचियिता तुच्छ कायरों तेरा भोग नहीं। !!३!! कर रहा है दुष्टता ऐसी प्रकट करने भी लज्जा लगे। माँ की थकी छाँव निहारो नारी की कहीं हाय न लगे। !!४ !! नेत्र खुले तूने जीस मार्ग से ऎसे ब्रम्ह का तू श्राप न ले। पुत्र है तू उसी नारी का हवस की शिकार न कर ले। !!५ !! माँ है मेरी यह प्रार्थना ऎसे व्यभिचारी को जन्म ही न दे। समाज में स्त्री की न रखे मान-मर्यादा ऎसी संतान की कोख में ही अंत कर दे। !!६!! कवी : - एन. आर. मातोंडकर (शिवदास ) मडगांव, गोवा स्नदर्भ चित्...