Posts

Showing posts from November, 2025

तीन पावलां गोंयचीं (कोकणी कविता )

Image
 "तीन पावलां गोंयचीं" गोंयच्या दानवानों सादूर जायात  तीन पावलां दान घेवंक,  बटू वामनाचें रूपणें घालून  पूर्वे सावन देव येतात..!! दानव खरें पुण दयावान तुमीं,  आपोवणें धाडून घरां दितले  तुमीं.  माड-माडयो चडूंक शिकयतले तुमीं, शेवटाक कपलार हात मारतले तुमीं...!! आवयचो भरयल्लो घास  विसरतले तूमीं, डोंगर-दरी सपाट करतले तुमीं.  प्राणवायु विकूंक बाजार उबारतले तुमीं.  कित्याक तर,पुर्वे सावन दान घेवंक देव येतात...!! झाडां-पेडां कातरतले तुमीं, आवयच्या आंगार कातरे धालतले तुमीं. सवण्यांक-पाखरांक शिस्त लायतले तुमीं, सोरपांक-वागांक एकाच पांजऱ्यान दवरतले तुमीं. गोंयचे सप्तऋषी दरबारांत बसल्यात,  गांव-वाठार जोकूंक लागल्यात. संजिवनिचो तिरस्कार करुंक लागल्यात, कित्याक तर, पूर्वे सावन दान घेवंक देव येतात...!! शिमा - शिमानीं चाळे धाडटले तुमीं,  ताशे - घुमटां फोडटले तुमीं. रोमटां - मेळ विसरतले तुमीं, कित्याक तर, पूर्वे सावन दान घेवंक देव येतात...!! सैमाक कॅमे-यांत सजोवन दवरात,  न्हंयो पिळटात तांचे फोटे काडून दवरात. वागा - कोल्यां काणयो बरोवन दवरात...

"प्रकाश से अंधकार की ओर"

Image
 "प्रकाश से अंधकार की ओर"     धरा का कालचक्र बदल रहा है, प्रकृति में बदले की भावनाएं  जागृत हो रही हैं । सृष्टि में वर्तमान में जो घटित हो रहा है उसे नापा नहीं जा रहा है, क्योंकी मनुष्य प्राणी ने आधुनिकता की कुल्हाड़ी प्रकृति की छाती पर चलाई है और इसी के रूपांतर में हमें वर्तमान में अनगिनत तरीके से प्रकृति का रौद्र रूप देखना पड़ रहा है। आए दिन कहीं ना कहीं नैसर्गिक घटनाओं के दुष्प्रभाव प्राणीजीव मात्र पर हो रहे है, सृष्टि में कालचक्र की रूप रेखा बदल रही है, पर्यावरण पर हम मनुष्यों ने आधुनिकीकरण की षडयंत्र से आघात पहुंचाया है, उसका हिसाब सूत समेत लेने अब सृष्टि ही मानव स्वार्थ के विरुद्ध कार्यक्रम चला रही है। यह  सब हम इंसानों को ज्ञात होते हुए भी हम अपने निजी स्वार्थ, अहंकार के कारण एक दूसरे की जान पर अड़े रहते है और धरा का नाश करने का षडयंत्र चला रहे हैं।         धरती पर नैसर्गिक कालचक्र की रूप रेखा अरबों-खरबों वर्षों से चलती आ रही है, इस धरा पर सदियों पहले से कई जीवों की रचनाओं  का निर्माण हुआ है और समय अनुसार उनकी जीवन शैली, आकार ,खान...