आजादी
*🇮🇳🇮🇳 आजादी 🇮🇳🇮🇳* था वह दिन १५ अगस्त भारत मां की स्वतंत्रता का।। मै भी था अति हर्षित निहारने मेला आजादी का।। सोचा इस अवसर पर भारत मां आनंदिमय होगी।। हर्ष उल्हास के रंग-संग भारत मां निर्भय रहेगी।। देखते ही देखते मेरी नेत्र शीतल बयार की चपेट में आ गई।। मेरी हर्ष उल्हास की तरंगे निद्रा काल में खो गई।। किया निर्णय भारत मां की खुशियों का सपनों में खूब मजा चख लूँ।। आजादी का हर्ष-उल्हास देख-देख सुखदाम -वरदाम आशीष पा लूँ।। इतने में मेरे कानों में पिडासे तड़पती कर्राहट सुन पड़ी।। वेदनाओसे लथ पथ धरती मां सिसक - सिसक कर रो पड़ी।। कहने लगी भारत मां अपनी व्यथा कौन ईसे समझेगा।। चल रहा पग-पग अत्याचार कौन मुझे इससे बचाएगा।। धरी रह गई मैं धमाको के गूंज से लहू - लुहान हो गया दामन।। भटक रही आत्माये निरअपराधो की ढूंढ रही हैं स्वंय का तन।। जन्में है भारत में पापी ऐसे विरोंका कफन भी बेच खाया।। अपने विरोंकी मर्दानगी कारण तु निडरता से सांस ले पाया।। भ्रष्टाचार तो ऐसा है फैला...