और मैं बोल पड़ा ( पेड़ की आत्मकथा)
लेखक- न. र. मतोंडकर (शिवदास) पर्यावरण विशेष लेख और मैं बोल पड़ा ( पेड़ की आत्मकथा) सुबह-सवेरे जब मेरी नींद खुली तो कई की सुरीली आवाजों ने मेरा मन मोह लिया। साथ-साथ मंद-मंद बहती बयार ने मेरी टहनियों को हिला डुलाकर सब पत्तों में रोमांच भर दिया में बड़ी खुशहाली से उन पंछियों की तरह-तरह की आवाजों का आनंद उठा रहा था। परन्तु इन मधुर आवाज के कलरव में कागराज की कर्कश आवाज ने जहर घोल दिया जिससे मेरा चित्त बिखर गया। मुझे उन आवाजों से घृणा होने लगी। मैंने तेज हवा के बहाव का सहारा लेकर अपनी टहनियों को जोर से हिलाकर कागराज को भगाने की कोशिश की मगर अफसोस वे उड़कर जाते और तुरन्त लौटकर वापस मेरे उपर बैठ जाते हैं। आखिरकार मेरी सब कोशिश बेकार गई तब मेरा ध्यान उनकी बातों की ओर आकर्षित होने लगा। जब ध्यान लगाकर उनकी बातों को सुनने की काशिश की तो मुझे ज्ञात हुआ कि वे सब मिलकर एक बुजुर्ग के खिलाफ अभियान छेड़ने का सलाह मशविरा कर रहे थे। वे कह रहे थे कि यह बुजुर्ग हमेशा हमें और इस पेड़ को सताता है। हमें देखते ही वह हमारे उपर कंकर पत्थर...