"एक कटु सत्य "
"एक कटु सत्य"
संसार रचियता ने इस सुंदर सृष्टि की रचना में हम सब प्राणिमात्र की भिन्न-भिन्न वर्गों में उत्पत्ति की है, हर एक प्राणी जीव की अलग-अलग वांशिक श्रृंखला के अनुसार उनकी जीवन शैली तथा रहन-सहन का कार्य बना दिया है। हर एक के निवाले की निर्भरता भी एक दूसरे से अलग वर्ग में विभाजित कर सबको क दूसरे पर निर्भर बना रखा है,हर एक जीव में अपनी वांशिक प्रणाली का ध्यान रखने तथा आचार विचार करने की क्षमता भी प्रदान की है। पंछी तथा अनेको जीव अंडो की उत्पत्ति रचने के उपरांत उन अंडो से नए जीव का आगमन होने तक का कार्य अति दक्षता से पार करने का ज्ञान रखता है, तथा पंछी अपने बच्चों की उड़ान भरने तक के सफर की नियमावली को अति नाजुकता से सफल बनाकर उन्हें अपनी जीवन चर्या जीने के लिए मजबूत बनाते है।
प्राणीजीव अपनी संतति की रक्षा कैसे करे यह सीखने या सिखाने किसी अन्य सलाहकार से सलाह नही लेते हैं, कहीं- कहीं नर-माद अपने वंश के पालन में इस तरह आपस में सहयोगी बनते हैं कि उनके प्रयासों के समक्ष मनुष्य का अपने स्वार्थी जीवन मे विवाह जैसे पवित्र बंधन भी विफल बनता देखा गया है। मनुष्य छोड़ अन्य जीव में भाषा विकसित न होते हुए भी वह अपनी भावनाएं अपने सहयोगी को समझाने में समर्थ रहते हैं, इन जीवों के कार्य की नियमावली के विज्ञान को समझना हम मनुष्य के लिए एक प्रश्नचिन्ह ही बना रहेगा। हर एक जीव अपना निर्णय अपना सही समय आने पर अपने आप ही से उपयोग में लाने में सक्षम होता है जैसे चिड़ियां का बचपन जिस घोंसले में हुआ ठीक वैसा ही घोंसला भविष्य में अपने बच्चों के लिए बनाना यह एक महान क्रिया विधाता ने इन जीवों में प्रदान की है।अर्थात विधाता रचित प्रत्येक जीव का कार्य ही उन जीवों के लिए धर्म साबित हुआ है, कोई भी धर्म तथा संस्कृतियां उन्हें उनकी जिम्मेदारियां नहीं सीखाती है। इन प्राणीमात्र के जगत में उनके कर्म में ही धर्म समाया है, ना की धर्म में कर्म।
अस्तित्व में हम मनुष्य प्राणी अपने कर्म को परखना भूल गया है, पूर्वकाल में आचरण प्राप्त पवित्रता तथा पुण्यशील चरित्र को ही अपना धर्म कहा जाता था और विपरीत कर्म तथा कार्य को अधर्म माना जाता था। लेकिन अब यह धर्म कर्म पर आधारित न रहकर गुटबाजी पर केंद्रीत हो गया है, हर एक धर्म के पालन कर्ता अपने धर्म में शिषोंकी संख्या बढ़ाने में लगा है। ऐसा करने के लिए साम, दाम, दंड, भेद जैसी कोई भी हद पार करने थोड़ा भी नहीं हिचकिचाते है, वह अपने धर्म का प्रचार तथा वाणी को अमृत समझने लगा है और अन्य धर्म की वाणी को जहर समझने लगा है। सभी धार्मिक गुट तथा संघों में षड्यंत्र, कट्टरता बढ़ती जा रही है। सब धर्म एक दूसरे का धिक्कार करने लगे है।इतना द्वेष कटुता देख कर धर्म का मानवता से सदुपयोग छोड़ दुरुपयोग हो रहा है, यही सारांश समझ में आता है।
धार्मिक संदेश कर्ता अपने धर्म में चल रहे अन्याय, कुकर्म को नजरंदाज कर अन्य धर्म में छुपे दुराचार को ही फैलाने की कोशिश में लगा है, अपने - अपने धर्मग्रंथों में लिखें अनेको सुंदर विचारों को छोड़ कहीं एक कट्टर सोच वाले विचारों को धर्म की रक्षा करने का कारण बनाकर जबरन समाज पर लागू करने चला है। इसके चलते हर एक धर्म दूसरे धर्म की कृति पर नाराजगी दिखा रहा है,धर्म अहंकार की चरम सीमा इतनी तीव्र बन गई है कि इस वैज्ञानिक युग में हम मनुष्यगण एकमत होकर सत्कर्म जरूर कर सकते हैं परंतु उनमें धार्मिकता आनेपर सबके विचार बिखर जाते है और कईबार सत्कर्म छोड़ धर्म की गठरी में समा जाते हैं। धर्म अहंकार से निकले अनुचित मार्गदर्शन के कारण हम मनुष्य धर्म गुटों में बट कर अलग-थलग बिखरता जा रहा है, सब मनुष्य बिज का मूलरूप एक ही रहने के बावजूद वह अपने आपको अन्य भिन्न प्राणी बीज के रूप में संभोधने लगा है।
वर्ण सभ्यताओं ने तो मनुष्य के सम रूपी बीज को इतना कर दूसरे से अलग किया है कि एक मनुष्य की तुलना हंस से की है तो दूसरे मनुष्य की तुलना कौवे से कर बैठा है।मनुष्य वर्ण द्वेष तथा परंपरा में इतना ना समझ बन बैठा है कि हंस और कौवे की भिन्न वंशावली कभी भी एकरूप बन कौन से न हंस अपना वंश बढ़ा सकता है,और न कौवा हंस से प्रजनन को बढ़ावा दे सकता है। उन्हें अपनी- अपनी वंशावली बढाने अपने ही वंश से साथी का चयन करना पडेगा यह सत्य है परंतु ऐसी अंधश्रद्धा से प्रेरित बन मनुष्य ने अपने ही बीज को मनुष्य बीज न मानते स्वयं के वंश की तुलना अन्य जीवों की वंशावली से करने लगा है। यह धर्म, परंपराओं से पले विकृती का असर मनुष्य की सोच में पल रहा है, मनुष्य ने ही स्वय को अलग- थलग वर्ग में बाट दिया है। ऐसी कट्टर रीति रिवाजों के चलते मनुष्य अपने शुभ विचारों को खो चुका है, और झूठी कहावते तथा अन्य अधार्मिक कटुताओं को ही अपना कर्म - धर्म मानकर मनुष्य ही मनुष्य का विरोधी बन चुका है। किसी - किसी ने ऐसी कहावतों पर गीत, भजन, प्रवचनों से धार्मिक ज्ञान के नाम बढावा देकर इस दुराचार का अधिक से अधिक उपयोग कर अपना नाम रोशन किया है और मनुष्य को अस्तित्व के प्रती भ्रमित बना दिया है।वैज्ञानिक विचार में ऐसी कहावतों का कुछ भी स्थान नहीं है यह जान कर भी ऐसी अधर्मी विष को अमृत मान असत्य को ही सत्य मान रहा है। अधिकतर धर्मज्ञानी धार्मिक ग्रंथ उपदेशों को अपने मतलब के अनुसार श्रोतागण को जैसा सुनाना चाहता है वैसा ही वह उस उपदेश का अर्थ समाज में प्रस्तुत करेगा और श्रोतागण वही अर्थ श्रवण कर अपने जीवन में सार्थक मानकर भविष्य में अमल करेगा, क्योंकी वैयक्तिक रूपा में उपदेश कारकों को उपदेश सुनाना और श्रोतागण को उपदेश सुनने की आदत जो बन चुकी है।
हम मनुष्य के निजी जीवन में कई तरह के संकट आते- जाते रहते है, इस संकटों से ग्रसित भयमुक्त होने कई तरह की के कर्मकांडो में उलझ जाते है।कोई भी चमत्कारी सोच आपके संकट तथा पीडा को नष्ट नहीं कर सकती है वह तो सिर्फ इतना ही कर दिखाते है कि, आपका ध्यान जीस पिडा पर हावी हो गया है उसे वहां से हटाकर अपनी ओर केंद्रित कर आपके विचारों पर काबू कर सके। इसको आप को जिस विषय की चिंता सता रही हैं वह तो वहीं की वहीं रहती है, सिर्फ आपका ध्यान उस चिंता पर से हटाने से आपको ऐसा महसूस होता है की आप संकट मुक्त हो गए हो।असल मैं अपनी चिंता दुर करने आप को अपने मन में सुविचार, सुकर्म,शांत मन जैसे प्रयासों की आवश्यकता की जरुरत रहती है और वर आपको अपने आप में परखना जरूरी रहती है। वास्तव में हम मनुष्य अपने जीवन के अस्तित्व की पहचान करना भूल गया है और मनुष्य वंश की वंशावली का विभाजन अन्य प्राणियों की वंशावली की तुलना में सहमत बन चुका है,हम सब धार्मिक विष का प्रशन कर अधर्म की ओर बढ रहे हैं।
मैं भी किसी परमेश्वर बोध के विरोध में नहीं हूं और मेरी भी उपस्थिति किसी न किसी परमेश्वरी तथ्य का आधार ले कर चलने मुझे प्रेरित करती है। अनेको धर्म ग्रंथो में कुछ समाज वर्जित लेखन हम मान सकते हैं, जो आज के समाजवर्ग में घातक ठहरता होगा तो बहुत कुछ सही विचार भी है। परंतु अच्छे योग्य विचारों का प्रयोग छोड़ कुछ अयोग्य विचारों से धर्म को बढ़ावा देने लगे है। मेरा मन कहता है की धर्म और उन धर्म से संबोधित परमेश्वर यह दोनों भिन्न अंग है,यह विष बाधित समाज समझ नहीं पा रहा है। परमेश्वर का समाज में आधार भक्ति है धर्म नहीं है क्यों की अब तक मैंने सुना है और समझा है कि निस्वार्थ, सुविचारी ,जन कल्याणी रूप से भक्ती करने से परमेश्वर का साक्षात्कार मिलेगा न की किसी धर्म में रहकर परमेश्वर मिलेगा।अर्थात कोई भी व्यक्ती अपनी मन शांती तथा अपने विचारों की शुद्धता के लिए अपनी सुविचारों को प्रेरीत कर सके ऐसे साक्षात्कारी यों की याद कर भक्ती करना है तो उस धर्म को परिधान करना ही है यह एकदम सरासर असत्य है। कोई मनुष्य किसी भी धर्म में से अपने विचारों को शीतल, शुद्ध ,शांत बनाने हेतु अपने मन को जो भाता है ऐसे साक्षात्कारी विचारों का आधार ले सकता है। वह परंपरा नहीं बननी चाहिए क्योंकि यह परंपराओका भविष्य में चलकर नए - नए धर्म में रूपांतर बन जाता है, इस धरा पर आदिकाल से कई संस्कृती यों का तथा परंपराओं का उगम हुआ है और अंत भी हुआ है। हर एक संस्कृती ,परंपरा, धर्म अहंकार आदी सब एक दूसरे को निगलने का ही तात्पर्य रखता है। यह धार्मिक संहार से रक्तपात पूर्वकाल से चलता आया है और अगर हम मानव अपने आप को संभल नहीं पाए तो भविष्य में मनुष्य वंश का नाश होने तक चलता ही रहेगा यह एक कटु सत्य है।
।। धन्यवाद ।।

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