और मैं बोल पड़ा ( पेड़ की आत्मकथा)
लेखक- न. र. मतोंडकर (शिवदास)
पर्यावरण विशेष लेख
और मैं बोल पड़ा ( पेड़ की आत्मकथा)
सुबह-सवेरे जब मेरी नींद खुली तो कई की सुरीली आवाजों ने मेरा मन मोह लिया। साथ-साथ मंद-मंद बहती बयार ने मेरी टहनियों को हिला डुलाकर सब पत्तों में रोमांच भर दिया में बड़ी खुशहाली से उन पंछियों की तरह-तरह की आवाजों का आनंद उठा रहा था। परन्तु इन मधुर आवाज के कलरव में कागराज की कर्कश आवाज ने जहर घोल दिया जिससे मेरा चित्त बिखर गया। मुझे उन आवाजों से घृणा होने लगी।
मैंने तेज हवा के बहाव का सहारा लेकर अपनी टहनियों को जोर से हिलाकर कागराज को भगाने की कोशिश की मगर अफसोस वे उड़कर जाते और तुरन्त लौटकर वापस मेरे उपर बैठ जाते हैं। आखिरकार मेरी सब कोशिश बेकार गई तब मेरा ध्यान उनकी बातों की ओर आकर्षित होने लगा। जब ध्यान लगाकर उनकी बातों को सुनने की काशिश की तो मुझे ज्ञात हुआ कि वे सब मिलकर एक बुजुर्ग के खिलाफ अभियान छेड़ने का सलाह मशविरा कर रहे थे। वे कह रहे थे कि यह बुजुर्ग हमेशा हमें और इस पेड़ को सताता है। हमें देखते ही वह हमारे उपर कंकर पत्थर की बरसात कर देता है। जब-जब यह पेड़ हमारे लिए मीठे मीठे आम पैदा करता है तो यह बुजुर्ग आम को कच्चे ही तोड़ कर आम के पेड़ को दुख पहुंचाता है और हमें पके आम खाने से वंचित रहना पड़ता है कई बच्चे भी आम के दिनों में हम पर पत्थर फेंकने में इसका साथ देते हैं और हमें तंग करते हैं। आखिर सब कागराजों ने मिलकर यह निश्चिय किया कि जब भी वह बुजुर्ग मेरी ठंडी छाया में बैठने आएगा तब हम सब मिलकर बारी बारी से उस बुजुर्ग पर हमला कर देंगे और उसे वहां से भगा देंगे
यह बात सुनते ही मेरी नींद उड़ गई। मैं गुस्से में लाल-पीला हो गया और जोर से चिख पड़ा। मेरी उस चिख की हड़कंप से सब फौरन उड़ गए। लेकिन आदत से मजदूर फिर लौटकर मेरी टहनियों पर आसन जमाने लगे। में तुरन्त दोल पड़ा, " हे कागराजों दूर हो जाओ मुझसे मेरी टहनियों पर बैठने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है....। चलो हो......।" यह बात सुनकर वे सन्न रह गए और उनकी कर्कश आवाज शांति में परिवर्तित हो गई। उनमें से एक वृद्ध कागराज ने मुझसे इतने क्रोच की वजह जानने की कोशिश की और में बोल पड़ा
'मेरा जन्म एक सड़क के किनारे हुआ था जहां मेरे आस-पास कोई भी मेरे साथी दिखाई नहीं दे रहे थे। वहां की घरा इतनी कठोर थी कि में पानी की एक बूंद के लिए तरसता था। उस सड़क पर गाड़ियों की इतनी भीड़ रहती थी कि क्या बताऊं। मुझे हमेशा गाड़ियों से निकलने वाला काला धुआं भक्षण करने को मिलता था। मेरा जीवन बहुत त्रासदायी बनता जा रहा था। उस हालात में मैं बिल्कुल जी नहीं सकता था। मैं रोज-रोज की परेशानियों से बहुत तंग आ गया था। मेरी उम्र भी बहुत कम थी। मैं और मेरी जड़े उस रास्ते की कठिनाईयों के कारण मुझे जरूरत के हिसाब से पानी नहीं मिलता या में बारिश का जल प्राशन कर उन पलों को जीता था। में और क्या कहूं बस अपने अंतिम पल गिन रहा था। एक दिन एक बुजुर्ग अपने नन्हें पौते के साथ उस सड़क के किनारे-किनारे जा रहा था। पोते को अपने दादा के साथ चहलकदमी का बड़ा आनंद आ रहा था। वे कभी अपने रास्ते को तो कभी आस-पास के क्षेत्र को देखते हुए जा रहे थे। चलते-चलते वहां से गुजरती गाड़ी का धुंआ उनकी नार्कों में चला जाता था, वे अपनी नाक पकड़कर बंद कर लेते थे। वे भी मेरी तरह धुंआ पीने को मजबूर थे वे दोनों धीरे-धीरे मेरे निकट आ रहे थे। उनके नजदिक आने से मेरे मन में डर भर गया। मेरा अंतिम समय नजदिक या वह बच्चा चलते-चलते मेरे पास पहुंच चुका था। जैसे ही उसने मेरे उपर पांव रखने के लिए उठाया, मैं जोर से 'बचाओ, बचाओ चिल्लाया। आश्चर्य की बात है। कि उसने मुझे रौंदने की बजाय अपना पांव बाजू में रखने की कोशिश में वह बच्चा गिरते-गिरते बचा। यह सब होने पर मेरी तो जान में जान आ गई। वह तुरन्त मेरी बाजू में आकर बैठ गया और मेरे कोमल पत्तों को प्यार से सहलाया और मुझे उखाड़ने की कोशिश करने लगा तो उसके दादाजी ने उसे डांटते हुए कहा, 'अरे बेवकूफ! इस पौधे में क्या रखा है आगे चल तुझे चाहिए तो में बाजार से फूलों के पौधे लाकर दूंगा लेकिन बच्चे ने दादाजी की डांट को सुना अनसुना कर मुझे ही लेने की जिद पर अड़ गया। आखिरकार दादाजी ने हार मानते हुए बड़ी सवाधानीपूर्वक निकाल कर अपने पोते को सौंप दिया। मुझे अपने हाथों में पाकर बच्चा खुशी से फूला न समाया उसने अपने दादाजी की सहायता से मुझे बड़ी सावधानीपूर्वक अपने घर के पिछवाड़े। खुले मैदान में लगाया।
इस दिन के बाद वह मुझे रोज पानी देता और मेरी खुब देखभाल करता और मेरी सुरक्षा के भी पूरे इंतजाम उसने कर दिए थे। देखत ही देखते में बढ़ने लगा और वह रोज मुझे देखकर प्रसन्न होता और मुझे भी उसकी खातिरदारी बहुत भा रही थी। हम दोनों एक दूसरे से बहुत प्रेम करने लगे। धीरे धीरे में आसमान छूने लगा।
दिन के बाद दिन और ऋतुओं के बाद ऋतुएं बदल गई और फिर एक मौसम ऐसा भी आया कि मुझमें पहली बार फूलों की बहार आ गई यह देखकर वह बच्चा बहुत प्रसन्न हुआ उसके बाद उसने मेरी देखभाल बढ़ा दी उसने मेरे फूलों और मेरी रक्षा के लिए नैसर्गिक कीटनाशक और खाद का इस्तेमाल किया इससे मुझमें बहुत शक्ति आ गई और मेरे फूल फलों में परिवर्तित होने लगे जब भी वह मेरे फलों को देखता खुशी से झूम उठता था अंततः मेरे उपर लगे आम एक-एक कर पकने लगे उसने कुछ आम तोड़े और कुछ ऐसे ही छोड़ दिए क्योंकि वह जानता था कि आम पर सिर्फ मनुष्य का ही अधिकार नहीं है वे तो जंगल के कई जीवों की मिठाई है। पर्यावरण के प्रति उसकी यह आस्था देखकर में स्तब्ध रह गया। मन ही मन सोचने लगा कि ऐसे पर्यावरण प्रेमी मनुष्य के इस धरा पर होते हुए पर्यावरण का संतुलन कभी भी नहीं बिगड़ सकता
अब मेरा तना बहुत मोटा हो चुका है और वह बच्चा भी अब बच्चा नहीं बल्कि एक बुजुर्ग दादाजी बन गया है। अब वह रोज अपने पोते के साथ टहलने निकलता है और मेरी विशाल छाया में आकर मेरे तने के पास विश्राम करता है और यह सब मुझे बहुत अच्छा लगता है जिस दिन वह नहीं आता है, में बहुत उदास हो जाता हूं जिस दिन वह बजुर्ग तने के पास नहीं बैठता में बहुत बैचेन हो जाता हूं क्योंकि वह मेरे तने पास बैठकर अपने पोते को अच्छी-अच्छी कहानियां सुनाता है उन कहानियों को सुनकर मेरा भी ज्ञान बढ़ता है। आज मैं जानता हूं कि मैंने इतना लंबा-चौड़ा शरीर पाया है और जिसकी छाया दूर-दूर तक फैल रही है यह सब बस इस बुजुर्ग की मेहरबानी है अब कोई बच्चा मुझ पर पत्थर फेंककर कच्चे आम तोड़ता है तो मेरे तने को थोड़ी बहुत हानि होती है। मगर इससे मेरे मन को बहुत शांति मिलती है। क्योंकि में उन बच्चों में उस बुजुर्ग की छवि ढूंढता हूँ और यह देखकर में प्रसन्न हो जाता हूं।
अब कहो कागराजों उस बुजुर्ग पर वार करने की उदंडता क्या उचित रहेगी ? ऐसे करने से कोई हल निकलेगा ? नहीं......1 बल्कि तुम कागजों के प्रति उस बुजुर्ग के मन में घृणा पैदा हो जाएगी और क्या इस घृणा के साथ इस धरा पर कोई भी प्राणी सुख तथा चैन से जी पाएगा? इसलिए मेरा एक ही कहना है कि तुम भी मेरी टहनियों पर शांति से जिओ और दूसरों को भी जीने दो...!!

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