ध्वनि प्रदुषण
कवि- न. र. मतोंडकर . (शिवदास)
ध्वनि प्रदुषण
भौर हुई तो मुर्गे ने किया इशारा,
कोयल बोली, देख रहा सपना दुलारा,
मैंना कहे, मत उठा, अभी है अंधियारा ।।
चिडिया ने कहा "है वह कल का सितारा",
तोता चहका "उठो बना है चमन हरा-भरा ।।
कितना सुंदर था वह रंगीन नजारा,
कैसे भुलू मैं आवाज वह प्यारा ।।
उठकर देखा बछड़ा था बेसहारा, पहुंची जननी सुनकर आवाज सुनहरा ।।
तृप्त मौसम से खलियान था हरा,
अनगिनत पुष्पों का अंदाज ही था निराला ।।
आज की हालत है कितनी बेदर्दी,
हड़बड़ाता हूं नींद से जब रेल है गुजरती।।
घबराहट से मेरी सांस है रूकती,
सोचने बैठूं तो कई आवाजें है मुझे सताती ।।
ध्वनि प्रदुषण से मेरी नींद उड़ गई,
उन पंछियों की आवाजें नक हां खो गई ।।
मेरी विचार-धारा विकृति में बदल गई,
कैसे पांऊ में शांति जो मुझे छोड़कर चली गई ।।
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