"प्रकाश से अंधकार की ओर"
"प्रकाश से अंधकार की ओर"
धरा का कालचक्र बदल रहा है, प्रकृति में बदले की भावनाएं जागृत हो रही हैं । सृष्टि में वर्तमान में जो घटित हो रहा है उसे नापा नहीं जा रहा है, क्योंकी मनुष्य प्राणी ने आधुनिकता की कुल्हाड़ी प्रकृति की छाती पर चलाई है और इसी के रूपांतर में हमें वर्तमान में अनगिनत तरीके से प्रकृति का रौद्र रूप देखना पड़ रहा है। आए दिन कहीं ना कहीं नैसर्गिक घटनाओं के दुष्प्रभाव प्राणीजीव मात्र पर हो रहे है, सृष्टि में कालचक्र की रूप रेखा बदल रही है, पर्यावरण पर हम मनुष्यों ने आधुनिकीकरण की षडयंत्र से आघात पहुंचाया है, उसका हिसाब सूत समेत लेने अब सृष्टि ही मानव स्वार्थ के विरुद्ध कार्यक्रम चला रही है। यह सब हम इंसानों को ज्ञात होते हुए भी हम अपने निजी स्वार्थ, अहंकार के कारण एक दूसरे की जान पर अड़े रहते है और धरा का नाश करने का षडयंत्र चला रहे हैं।
धरती पर नैसर्गिक कालचक्र की रूप रेखा अरबों-खरबों वर्षों से चलती आ रही है, इस धरा पर सदियों पहले से कई जीवों की रचनाओं का निर्माण हुआ है और समय अनुसार उनकी जीवन शैली, आकार ,खान-पान आदि में भी बदलाव होता गया है। कई जीव लुप्त भी हो गए तो कई जीवों की नव रचना भी होते गई है। समय अनुसार सूर्योदय-सूर्यास्त होना, अमावस्या-पुर्णिमा होना, सागर में ज्वार-भाट आना, एक के बाद एक विषाणु, जीव-जंतुओं की श्रृंखला तैयार होना, यह सब प्राकृतिक कार्य अपने आप चलते रहने वाली धरा की नियमावली से संपूर्ण जीवों की रचना जीवन उद्धार, आकार तथा लोप होने का कालचक्र चलते रहता है। हर एक प्राणी की जीवन शैली एक दुसरे पर निर्भरता की श्रृंखला से जुड़ी हुई है। इस तरह प्राणियों की संख्या में नियंत्रण का कार्यक्रम भी अति सहजता से पर्यावरण संभालता है और हर एक प्राणियों की वंशावली को संतुलित रखता है।
अब हम युद्ध की पर्यावरण पर होने वाले परिणामों पर नजर डालने की कोशिश करेंगे, की यह अनेक युद्ध कब सही हुआ करते थे और कब गलत साबित हो रहे हैं । पूर्वकाल की लड़ाईयां और अब के इस घातक लड़ाइयों में क्या अंतर बना हुआ है। धर्मवाद, नस्लवाद,वर्णवाद एवं समाजिक तिरस्कार के साथ भूमि के पेट में छुपे हुए धातुओं के अति लोभ के परिणाम ने हमें कई युद्धों के मैदान में लाकर खड़ा कर दिया है। युद्ध कोई भी हो उस युद्ध से कभी किसका लाभ नहीं हुआ है, इसका अंत अति वेदनात्मक पीड़ा से ही भरा हुआ रहता है।
पूर्वकाल में रक्तपात से लड़नेवाला युद्ध मानव संहार से ही समाप्त होता था, मानव ही मानववंश का शत्रु हुआ करता था। इनमें पर्यावरण तथा अन्य प्राणी जीवों की भूमिका न के बराबर हुआ करती थी। लड़ाइयां तो छोटी-मोटी हुआ ही करती थी परंतु पर्यावरण के कालचक्र पर घातक असर नहीं हुआ करता था, इन युद्धों का धरा पर किसी भी वन्य प्राणी, पेड़-पौधों की जीवन शैली में बाधा नहीं पहुंचती थी। वह लड़ाइयां मनुष्य के संघर्ष के अंतर्गत ही सीमित होती थी, उन लड़ाइयों का प्रकृति पर कुछ भी हानिकारक परिणाम नहीं होता था।सब प्राणीजीव निर्भयता से बिना कोई संकोच अपनी जीवनचर्या चलाते थे,हम मानव अपनी महत्वाकांक्षा, अहंकार,अतिलोभ मोह की जितनी चाहे लड़ाइयां लड़े सृष्टि की नियमवाली में कुछ भी बाधा नहीं पहुंचती थी। परंतु उन आदिकालीन युद्धों से एक निष्कर्ष जरूर निकलता था और वह है मनुष्य की जनसंख्या पर नियंत्रण वह लड़ाइयां धर्म, राजपाट,नस्ल,वर्ण व्यवस्था आदि पर वर्चस्व पाने लड़ी जाती थी और अपनी ही बढ़ती आबादी पर रोक लगने से जन संख्या नियंत्रण में रहा करती थी। ऐसे युद्धों का अंत शायद मानव वंश नियंत्रण के हित में हि होता था,उन युद्धों से मानवता की सामाजिक रूप रेखा में बदलाव जरूर होता था। कई नई संस्कृतियां, परंपरा,रीति रिवाज का उगम भी होता था याने हम सुधारित मनुष्य वर्ग का अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रयास जारी रहता था।
वर्तमान में चल रहे युद्ध में विज्ञानी आधुनिकीकरण का संपूर्ण रूप से सहभाग हो चुका है, विज्ञानी सहभाग के चलते अबतक दो महा विश्वयुद्ध का विनाशी परिणाम संपूर्ण विश्व झेल चुका है।जापान में हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु हमले उपरांत दूसरे महा विश्वयुद्ध का अंत तो हो गया परंतु अबतक उन परमाणु किरणों के उत्सर्जन की पीड़ा प्राणीमात्र विकृतियों से भुगत रही है।उस परमाणु विस्फोट को हम अब सिर्फ एक प्रायोगिक रूप से देख सकतें है, लेकिन अब का यह आधुनिक उपकरणों से सुसज्ज षड्यंत्री युद्ध सिर्फ एक प्रयोग तक ही सीमित नहीं रहेगा। वर्तमान में जिन देशों में भीषण युद्ध चल रहा है उन युद्धों का परिणाम उनकी सरहद तक ही सीमित नहीं रहा है, भले ही उनका आपसी युद्ध उनकी सरहद के अंतर्गत ही होता हो। उन युद्धों में किया हुआ आधुनिक विस्फोटों ने मानव रचित कॉन्क्रीट जंगल का पतन तो किया ही साथ में धरती के कालचक्र पर भी बाधा पहुंचाई है।उन देशों की आपसी लड़ाई धीरे - धीरे विश्व को अंत के करीब ला राही है, क्योंकि लड़ाई में लगातार होने वाले विस्फोटों से निकली उर्जा के कारण धरा पर अचानक से तापमान में बढ़ोत्तरी हो रही है। एकसाथ अनेक भयंकर विस्फोटों के असर से पर्यावरण में गर्मी की तीव्रता बढ़ती जा रही है, क्योंकि जिस भूखंड पर यह विस्फोट हो रहे है उसी दायरे में यह उर्जा कदापि सीमित नहीं रहती है।
अपनी धरा तो हर २४ घंटे में अपने आप में एक फेरा पूर्ण करती है, इस कारण जिस भूखंड में यह विस्फोट से ऊर्जा का निकास होता है वह ऊर्जा हवा तथा पर्यावरणीय दबाव के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होती रहती है। इस कारण भूमिपर बढ़ते हुए तापमान को शीतल करने पर्यावरण में हलचल शुरू हो जाती है, जितनी अधिक मात्रा में विस्फोटों से गर्मी उत्पन्न होकर फैलती जाएगी तुरंत उस गर्मी को शीतल करने उतनी ही तेजी से पानी की भाफ तैयार होती ही जाएगी। यह एक पर्यावरण को संतुलन बनाए रखने की नैसर्गिक कार्यशैली जारी रहती है, यह भाफ जितनी तीव्रता से बनती जाएगी उतना ही भयंकर विनाशी परिणाम भूमि पर बढ़ता ही जाएगा। इसके फलस्वरूप सृष्टि में अनगिनत वर्षा, बादलों का बार-बार फटना ऐसी अनेक आपदाएं आती रहेगी, परिणामी धीरे-धीरे अधिकांश देशों के भागों में बाढ़ का प्रभाव बढ़ कर गांव शहर जलमय होते ही जायेंगे। अगर अन्य देश हाथ पर हाथ धरे बैठे ही रहेंगे तो यह जो खतरे की घंटी बजने शुरू हुई है, वह धरा के सर्वनाश उपरांत ही थम जाएगी।
धरा ने दो-दो महा विश्वयुद्ध को झेला है और इसका परिणाम भी सहा है। इन युद्धों में हम मनुष्यों ने जो भी आधुनिक उपकरणों का सामर्थ देखा है, यह तो सिर्फ एक आंशिक दिखावा है पूरी चित्रफित अभी बाकी है। विज्ञान के सहारे हम मानव वंश अंधेरे से प्रकाश की ओर तो बढ़ते गया है परंतु इस प्रकाश में चलते-चलते विज्ञान के सदुपयोग के साथ- साथ दुरूपयोग को भी साथ लेकर चलते आया है। ऐसा लग रहा है कि धीरे-धीरे आधुनिक देश, विज्ञान को बढ़ावा देते-देते विश्व को प्रकाश से अंधकार की ओर ढकेल रहे है। इसका अंत हम मानव पर्यावरण के साथ संपूर्ण सजीव सृष्टि का सर्वनाश बनाकर ही थमेगा, धरा को सजीव से निर्जीव बनने पर ही इनका शायद अगला चरण साबित हो सकता है।
जब तक हम मानव वंश अपना अहंकार, अतिलोभ, दुर्विचार, वैमनस्य की गठरी को बाजू रखकर हाथ से हाथ मिलाकर समस्या का हल नहीं निकालेंगे, तब तक मानव के कुकर्म का बदला सृष्टि लेकर ही रहेगी। यह एक अपरंपार सत्य है, आगे चलकर अगर विश्वयुद्ध हो भी गया तब इसे महा विश्वयुद्ध के बदले महा मूर्खयुद्ध ही कहना पड़ेगा....!!
====== धन्यवाद ======
लेखक : नरसिंह र. मातोंडकर. (शिवदास)
मडगांव-गोवा.

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