अवांछित अपेक्षाएं-एक भ्रष्टाचार घर-परिवार से
लेखक : एन. आर. मतोंडकर (शिवदास)
अवांछित अपेक्षाएं-एक भ्रष्टाचार घर-परिवार से
भारत में सामाजिक भ्रष्टाचार के किस्से देखे जाएं तो एक नहीं कई तरह के पाए जाते हैं और कोई एक-दूसरे के कमतर नहीं जान पड़ता है।इन भ्रष्टाचारों की वजह निजि स्वार्थ,लोभ,भौतिकवाद,शार्टकट तरीके से सबकुछ हातीया लेना आदि रहते है तथा और भी कई कारण हो सकते है। मानसकि विकृतियाँ के चलते कई परिवारों में दरारें आ चुकी हैं, परिवार का हर सदस्य परेशान सा, व्याकुल सा लगने लगा है।परिवारीक उलझनों एवं बिना मेहनत अपनी उम्मीदें हांसिल करने हेतु सुख-शांति खोता जा रहा है। ऐसी मनस्थिती में वह समाज में फैले ढोंगी बाबाओं, तांत्रिकों के चंगुल में फंसकर अपना सारा धन और परिवार का सुख चैन गवां बैठता है । एक गलत कदम के चलते वह अपने पूरे परिवार की सुख-शांति दांव पर लगा देता है । उसे यह ज्ञात नहीं है कि स्वय के सिवाय अपने दुःख का निवारक और कोई हो नहीं सकता है, बाबा उसका ध्यान सिर्फ असल समस्या से हटाकर अन्य विषयों पर केंद्रित कर उसे भटका देते हैं।
ऐसी स्थिति किसी न किसी रूप में हर परिवार में मौजूद है । हम पारिवारिक सदस्य लोभवश उसे अनदेखा कर देते हैं जो आगे चलकर यही अनदेखी समस्या विकराल रूप ले लेती है और परिवार के पतन का कारण बनती है । परिवार के सदस्य अपनी मनमानी आकांक्षाओं को पूरा करने हेतु बच्चों पर पढ़ाई के लिए अनावश्यक दबाव डालते हैं। हम माता-पिता बच्चों को भला-बुरा, स्वविवेक, उचित-अनुचित का भेद बताने की बजाय कैसे भी सफलता हांसिल हो ये समझाने का प्रयास करते रहते है। परिवार के सपनों की गठरी भारी होती जाती है और बालमन यह सब सह नहीं पाता है।
घर में संतान के जन्मते ही बालक को अच्छी शिक्षा जिससे अच्छी कमाई हो सके, दिलवाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है | अपने सपने बच्चों के माध्यम से पूरा करने के लिए उन्हें नामचीन स्कूलों में दाखिले की उम्मीद लगाए रहते हैं। यहिं से सब खेल शुरू हो जाता है। जितनी बड़ी संस्था उतनी बड़ी फीस ।इतनी ज्यादा फिस भरने के चक्कर में माता-पिता अपनी सुख-शांति खो देते हैं, बच्चों में अच्छे संस्कार के बीज डालना भूल जाते है। बच्चे माता-पिता, गुरुजन की आकांक्षाओं के बोझ के तले दब कर कटपुतली बन अपना बचपन भूल जाते हैं। अंकों के खेल में बच्चे पिसते जाते हैं। नैसर्गिक विकास कहीं न कहीं थम सा जाता है बच्चों की खुशियां खत्म हो जाती है और इस प्रकार दुखी होकर वह माता-पिता, गुरुजनो के विरुद्ध मन ही मन जंग छेड़ देता है। धीरे-धीरे वह मात पिता तथा गुरुजनोका आदर-सम्मान नही करता है। ऐसी मनःस्थिति में माता-पिता बच्चे के मन को पढ़ने की बजाय उसे निकम्मा,अनपढ़, गवार आदि अपशब्दों से उसे संबोधित कर उसका मनोबल नीचा कर देते हैं। माता-पिता की होड सिर्फ बच्चे की पढ़ाई और परीक्षा में हांसिल अंकों पर रहती है । उन लुटेरों शिक्षण संस्थाओं की लम्बी-चौड़ी फीस पर नहीं होती है, इस प्रकार बच्चे पर अत्याचार बढ़ जाता है।
अपनी संतान पढ़ लिखकर सिर्फ और सिर्फ हर बढिया पद हांसिल करे इस होड़ में माता-पिता जीवनभर गठित पूंजी को दांव पर लगा कर अपना जीवन दुःखी कर लेते हैं और अपने हिस्से के खुशी के पल भी गंवा देते हैं। संतान बीस साल बाद क्या बने इस जुगत मेंअपना पूरा जीवन भ्रष्टाचार, अत्याचार में झोंक देते हैं। ऐसी भूल को बच्चे के लिए हित मानते है, लेकिन बच्चा क्या चाहता है, उसकी अपनी क्या सोच है, उसका दिमाग किस दिशा में प्रगति कर सकता है इसका अनुमान न लगाकर बच्चों पर अपनी मनमानी बाँध देते हैं जिससे असंस्कारी बच्चे आगे चलकर डीग़्रीयां और पद तो हांसिल करते हैं लेकिन अपने कर्तव्य के प्रति लापरवाह हो जाते हैं।
समाज परिवार में व्याप्त इस भ्रष्टाचारी अत्याचार ने कई परिवारों में दरारें डालकर उनका सुखचैन छिन लिया है । ऐसे सिस्टम, रिवाज, विचारधारा को अब पूर्णविराम लगाने की जरूरत है ताकि सफल, सुखी, संस्कारित परिवार का निर्माण किया जा सके । संतान मोह के कारण फैली इस मनोविकृति के ढांचे को बदलकर नई पद्धति का विकास करना ही समाज के हित में उठाया हुआ अहम कदम साबित होगा।
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