पुनः एक अवतार
पुनः एक अवतार
लेखक :एन आर मतोंडकर.
पूरे ब्रमांड में हाहाकार मच गया कि संसार के पालनहार विष्णुजी और उनकी अर्धांगिनी हो गए हैं लापता , नारद मुनी नारायण - नारायण का स्मरण करते अपनी वीणा को झंकृत करते- करते पूरे आकाशगंगा के कोने-कोने में जाकर भगवान को खोजने लगे परन्तु उनका प्रयास बेकार गया,उन्हें विष्णु और उनकी हर अर्धांगिनी का कहीं कुछ पता नहीं चला। नारद जी को चिंता सताने लगी कि कही राक्षसों ने उन्हें बंदी तो नहीं बना लिया ? नारद जी ढूँढते-ढूँढते पाताल लोक में भी जा पंहुचे लेकिन वहां कि स्थिति तो और भी दयनीय लगी। वहां के राक्षस बुरी तरह बीमारियों में जकड़े हुए थे। उनमें ऐसी शक्ति नहीं बची थी कि पहले जैसे अनर्थ कर सके। परन्तु ऐसा क्या हुआ कि नारायण को अपना आसन छोड़ पलायन करना पड़ा ? नारद जी की चिंता और गहरी होती चली गई। वह अपनी समस्या का हल ढूंढने ने देवादीदेव महादेव के पास पहुंचे गए और अपनी चिंता से महादेव जी को अवगत कराया ।
महादेव एकदम गंभीर हो गए, फिर कुछ क्षण के बाद देखते ही देखते समाधी में लीन हो गए । इससे नारदजी की चिंता और भी गंभीर रूप धारण करने लगी संपूर्ण जगत में एकमात्र महादेवजी ही है जो विष्णुजी का पता बता सकते है ,परन्तु वह भी नारदरजी को कुछ बताये बिना ही योग में लीन हो गये । यह दृश्य नारदजी को रास नहीं आया और उन्होंने शिवजी को योगनिद्रा से जगाने की चेष्टा की। उनके इस दुस्साहस से शिवजी क्रोधित हो गए, उनकी तपस्या भंग हो गई । शिवजी समझ गए कि नारदजी की इस उदंडता के कारण विष्णुजी से संपर्क अधूरा रह गया। शिवजी ने नारदजी के इस व्यवधान से उनको परिचित करवाया । नारदजी ने शिवजी से क्षमा याचना की और इस प्रकार शिवजी शांत हो गए। तदोपरान्त उन्होंने विष्णुजी की जो भी जानकारी मिली वह नारदजी से अवगत कराते हुए शेष कार्य स्वय पूरा करने की सलाह देकर फिर समाधी में लीन हो गए।नारदजी ने शिवजी से अनुमति लेकर इस धर्म संकट से बचने के लिए विष्णुजी को ढूंढने प्रारंभ किया ।
शिवजी ने नारदजी को विष्णुजी के नवरूप (अवतार) धारण कर धरा पर कार्यरत हो चुके है, यह तो बताया लेकिन किस रूप में तथा उनके कार्य के संबंध में जानकारी नहीं दी और नारदजी को महादेव की योग साधना को खंडित करने का कारण बता दिया और अपनी योग साधना में लीन हो गए।
नारदजी बिन विलंब कीये धरा पर प्रकट हो गए , नारदजी "नारायण-नारायण" का जाप करते हुए इधर-उधर विष्णुजी की खोज में लगे रहे। विष्णुजी उन्हें कहीं नहीं मिले लेकिन वे बच्चे-बड़ों सबकी चेष्टा का कारण बन गए। धरती के लोगों ने भी इस अजब दृश्य का खूब आनंद उठाया। लोगों से पीड़ित नादरजी ने छुटकारा पाने के लिए अपना दिमाग लगाया । नारदजी पेरशान थे, उनके अंर्तमन के बोल धरा के लोगों को सुनाई नहीं दे रहे हैं। आधुनिक युग पुरी तरह से बाहरी काया, उसके सौन्दर्य और आधुनिक वेषभूषा पर केंद्रीत है। यदि धरा पर प्रकट होकर विष्णुजी को ढुंढना है तो उन्हें भी असाधारण वेशभूषा अपनानी होगी। मगर नारद जी के गले में लटकी वीणा किसी भी वेशभूषा पर नहीं जचती थी और उसे वे त्याग भी नहीं सकते क्योंकि यही तो नारदजी की पहचान है। आखिरकार उन्होंने ठान ली कि वीणा भी नहीं छोड़ुंगा और आधुनिक भी बनूंगा। उन्हें गले में लटके यंत्र के साथ कार्यरत होना ही था।
नारदजी अपनी पहचान की खोज में निकल पड़े। उन्हें अपनी पहचान बनाने के लिए कला का मंच चुनना पड़ा । उन्होंने सितार, वायलीन आदि तरह-तरह के वाद्य यंत्रों के साथ छेड़खानी की मगर अफसोस एक भी वाद्य उनके काम नहीं आया । कारण वे सब यंत्र एक जगह बैठकर ही इस्तेमाल किए जा सकते थे। अगर नारद जी ऐसा करते तो अपने कार्य में कैसे सफल हो पाते उन्होने बड़ी चतुरता से बीड़ा उठाया। अब उन्होंने पश्चिमी शैली की वेशभूषा का चयन किया। उन्होंने अपने लंबे-लंबे बालों की बहुत सारी छोटी-छोटी चोटियां बना कर कंधे तक लटका लिया और महा भंयकर दिखने लगे। गले में विणा की जगह गिटार लटका लिया । हाथों में उपली की जगह माईक थाम ली और कपड़ों की तो पूछो मत... उन कपड़ों में तो ये रॉक स्टार लगने लगे । इस प्रकार नारद जी भगवान विष्णु और उनकी अर्धागिनी को खोज में निकल पड़े।
अब नारदजी विष्णुजी की खोज में जगह-जगह नाच गाने का 'नाईट शो' प्रस्तुत करने लगे। वे सोचते कि विष्णु जी कभी न कभी रासलीला के मूड में आ जाएंगे और नारदजी उन्हें पकड़ लेंगे। वे जानते थे कि विष्णुजी रासलीला में माहिर है। ऐसे कई रातें बीत गई लेकिन वे विष्णुजी का पता नही लगा सके। उल्टे नारदजी 'नाईट शो' कर करके इतने प्रसिद्ध हो गए कि पूरा विश्व उन्हें "नेरी द सिंगर "के नाम से जानने लगा ।
नारद जी को अपनी प्रसिद्धी से ज्यादा अफसोस विष्णु जी को खोजने के अपने अभियान में असफल होने से लगने लगा । अब उन्होंने निश्चय किया कि रात्रि में ही विष्णुजी को खोजने से काम नहीं चलेगा, उन्हें दिन में भी खोजना पड़ेगा । एक दिन नारदजी दिन में अवतरित होकर विष्णु जी को ढूंढने चले, नारदजी ने विष्णुजी को सब जगह ढूंडा परन्तु विष्णुजी उन्हें मिल न सके । अब नारदजी पूरी तरह से थक चुके थे। उन्होंने अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी की बोतल खरीद ली और लगे जोर से पानी पीने और देखते ही देखते एक झटके में उन्होंने पानी की बोतल खाली कर दी। उन्होंने यहां वहां देखा कि खाली बोतल कहां फेंक दूं ? जहां भी देखते वहां पुलिस तथा लोगों की इतनी भीड़ थी कि वे उस प्लास्टिक की बोतल को रास्ते या आजुबाजू कहीं भी फेक ने का साहस नहीं जुटा पाए और वे कचरा पेटी की तरफ चल पड़े ।
नारद जी ने देखा कि कचरापेटी से एक पुरुष और एक महिला दबा-दबाकर प्लास्टिक की बोतले प्लास्टिक अपनी-अपनी गठरी में बांध रहे हैं। नारदजी ने भी अपनी खाली बोतल उस कुड़ेदान में डाल दिए और वही कृतज्ञतापूर्वक उन दोनों की तरफ नजर घुमा दी । उन्होंने मन ही मन गनगुनाया कि 'पेट पालने हेतू मानव को क्या-क्या नहीं करना पड़ता है..! यह भी कुछ काम है भला, धिक्कार है ऐसे जीवन पर...!यह इतनी छोटी सी जिंदगी जीने के लिए इतने सारे कष्ट...?'यह बात नारदजी मन ही मन कह रहे थे, परन्तु उनका भावार्थ उन कचरा चुनने वालों को बराबर समझ में आ रहा था। नारद जी ने फिर एक बार उनकी नजरों में नजरें डालने की कोशिश की और वे दोनों भी नारद जी को एकटक नज़र से देख रहे थे। नारद जी ने अपनी नजर घुमा दी और आगे चलने को होने ही वाले थे कि अचानक उनके कानों में कुछ अद्भुत शब्द गुंजने लगे । उन्होंने सुना कि वह महिला अपने पति से कह रही थी. 'देखा प्रभु, नारदजी भी हमें पहचान नहीं सके, ये भी इन मानवों के बीच रहकर मूर्ख बन गए हैं...!'यह बात सुनकर नारदजी के पैरो तले जमीन ही खिसक गई नारदजी ने तुरन्त जाकर विष्णुजी के चरणों का आलिंगन किया और बोले, "प्रभु मैंने आपको कहां-कहां नहीं ढूंडा परन्तु आप यहां इस हालत में क्या कर रहे है...? आपका विलासी सुख-भोग कहां विलुप्त हो गया...? यह कौन सी सजा काट रहे हैं आप दोनों नारायण...? भगवान चलिये, आप अपने वैकुंठ में, यह सब आपको शोभा नहीं देता है प्रभु ....!' विष्णुजी बोले, "मुनीवर, शांत हो जाओ, आपने देखा नहीं हम क्या कर रहे हैं..? नारदजी बोले, 'भगवान आप पूरे ब्रम्हाण्ड के पालनहार है और यहां आप यह कौनसा तुच्छ कार्य कर रहे हो प्रभु ...? कचरापेटी में हाथ डालकर कुड़ा-कचरा चुन रहे हो...! आप इस भौतिक जगत् की जनता की झूठन को अपने पवित्र हाथों से उठा रहे हो ...! यह कौन सा युग चल रहा है जिसके चलते आप पर यह संकट आ गया है ...?'
विष्णुजी ने अति प्रसन्नता से नारद जी को उठाया और अपने गले से लगाते हुए बोले, 'यह संकट मुझ पर नहीं बल्कि धरतीमाता पर आया है, जिसने इस पर निवास करने वाले समस्त जीवों को अपना जीवन व्यतित करने के लिए सहारा दिया है और उन्हीं में से एक जीव जिसे मानव कहते हैं वही आज धरती की जान पर खेल रहा है...!' यह बात सुनकर नारदजी आश्चर्यचकित हो गए और बोले, 'बताईये श्रीमद यह क्या राज है ...? विष्णुजी ने सविस्तार से बात बताना आरंभ किया। वे बोले, 'इस विज्ञान के युग में मानवों ने आविष्कार कर बहुत प्रगति की है, परन्तु इस प्रगति के दुष्परिणाम नही खोजे है। जिसके चलते धरती पर कई जीव तथा पेड़-पौधे अल्पसंख्यक बन चुके है और कई तो लुप्त हो चुके है। इस कारण घरा का संतुलन बिगड़ चुका है । ऐसा ही एक आविष्कार जो आज धरती का सिरदर्द बन चुका है जिसे 'मानव रचित रसायन-कोयला मिश्रित पटक (प्लास्टिक)' कहते है...! इसने धरती पर बचा हुआ अमृत का सेवन कर अपने आप को अजर-अमर बना लिया है। इसे न धरा, न अंबर, न स्वर्ग, न पाताल, न घर के भितर, न घर के बाहर, न शस्त्र से, न अस्त्र से, न यंत्र से, न तंत्र से और न मंत्र से इस पर विजय नहीं पाई जा सकती है, इसी कारण आज धरती माता संकट में है। मुनिवर...!आपको तो पता ही है कि जब-जब धरा तथा ब्रम्हाण्ड में कोई संकट उभरता है, तब-तब मैं अवतरित हो जाता हूं और यही प्रकृति का नियम है। इस कारण मैंने और मेरी अर्धागिनी ने इस धरती को साफ-सुथरा रखने के लिए लाखों जन्म लिए है...! इस धरा पर अब मंदिर तथा अन्य स्थानों पर अपना वास कम ही नजर आता है। परन्तु वे लाखों-करोड़ों गरीब अपनी दिनचर्या को कुड़ा-कचरा उठाते तथा धरती माता को साफ-सुथरा करके अपना जीवन गुजार रहे हैं। उनके अंग-अंग में मेरा कण-कण व्याप्त है। इस धरा पर अपने आपको साफ-सुथरा समझने वाले भूवासी जब यह प्लास्टिक बिना सोचे-समझे कही भी फेंक देते हैं तब धरा का अंत निकट आने लगता है...! इस से पानी की पवित्रता और बहाव में बाधा पहुँचती है,कई औषधीय पेड-पौधे लुप्त हो चुके है...! प्राणीमात्रका जीवन भी अस्त हो चुका है, कई तरह की बिमारियों से जीवन ग्रस्त हो चुका है, गंगा जैसी पवित्र नदियाँ बादबुदार नाले बन चुके है, इसी कारण धरतीमाता कई रोगों से ग्रस्तित है...! एक युग था जब धरतीमाता स्वयं मानव को जननी की रूप में देखती थी, पर अब मानव के अनुचित व्यवहार से उससे घृणा करने लगी है। वह मन ही मन आंसू बहा रही है और ऐसा ही चलता रहेगा तो धरतीमाता के प्रकोप से कोई बच नहीं पाएगा..! 'इसलिए इस धरती को बचाने हेतु में आज जिस मानव को निम्न स्तर का और असभ्य समझा जाता है, उस वर्ग में अवतरित हो गया हूँ..!उनके साथ रहकर मैं उन्हें स्वास्थ्य और मेरी अर्धांगिनी उन्हें धन दान दिया करती है और जब तक उन बदबूदार नदियों में गंगा जैसा पवित्र जल ना बन जाता तब तक मेरा यह कार्य अनवरत चलता रहेगा...!
'अब मेरा वास किसी मंदिर, मस्जिद ,या वैकुंठ जैसे स्थानों पर ना होकर इन दुर्बलों में जो एक वक्त की रोटी भी बड़ी कठिनाई से ढूंढने हेतु कुडेदान टटोलने में तथा अन्य स्थानों पर प्लास्टिक की गठरी माथे पर उठाते इन कष्ट सहने वालों में होगा...!भले ही उनके शरीर से गंदगी की बू आती रहे लेकिन उनके अप्रतिम कार्य से धरा को बड़ा सुकून मिलता है..! सभ्य समाज जिन्हें घृणित नजरों से देखता है, मैं उन घृणा सहनेवालों के हृदयों में वास करता हूं, अब यही मेरा नया रूप है, कोई माने या न माने सबकी भलाई मेरे अवतार का कारण है...! '
'मेरी पुरी मानवजाति से गुहार है कि अब तो सुधर जाओ और स्वच्छ, निर्विकारी जीवन जीने के लिए कदम उठाओ...!जब धरा स्वच्छ होकर मनुष्यों को तो ममताभरी नज़रों से देखेगी तब मेरे आशिष का लाभ सबको बिन भक्ति,बिन पूजा से मिलता रहेगा..!स्वच्छ धरा ही मेरी पूजा है, यह बात सब अच्छी तरह से जान लो...!इस पूजा से सबमें अच्छे स्वास्थ्य तथा पवित्र विचारों का प्रभाव बढ़ेगा,परिणामस्वरूप धरती पर सतयुग प्रारंभ होता दिखाई देगा ...!यह मैं सब मानवों को वचन देता रह हूँ...!
यह सुनते ही नारद जी बोले, 'प्रभु, धन्य हैं आप और आपकी महिमाअपरंपार है..!मैं तो चला कैलाश शिवजी के दरबार में इस सुंदर महिमा का वर्णन करने...!'नारायण, नारायण कहकर नारदजी प्रस्थान हो गए ।
टिप्पणी: इसके साथ ही लेखक की यह समस्त धरतीवासियों से प्रार्थना है कि जैसे भगवान हम बच्चों को साफ-सुथरा रखना चाहते हैं, वैसे ही हम भी अपनी इस प्यारी धरती मां को स्वच्छ रखने में अपना योगदान प्रदान करें ।

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