प्राणवायु और जीवन प्रणाली


  प्राणवायु और जीवन प्रणाली

लेखक - न. र. मतोंडकर (शिवदास) 


   समस्त ब्रम्हाण्ड में स्थित अनेकानेक आकश गंगाएं उनके चुंबकीय क्षेत्र में कई सौर मंडल और उन सौर मंडलों में अपनी-अपनी क्षमतानुसार तारे, ग्रह-नक्षत्र, उपग्रह, धूमकेतु आदि अनेकानेक रहस्यों से भरा यह चुंबकीय चक्र अरबों-खरबों वर्षों से कार्यरत है । यह एक सुंदर, अद्भूतरचनात्मक है। इस रचना की शुरूआत और अंत का ठाव ठीकाना लगाना एक कल्पना ही रही है ।

   माना जाता है कि यह पुरा रचनाक्रम ब्रम्हाण्ड में स्थित दो महाभयंकर जड़ आकृतियों के टकराने से हुआ है और यही कारण हो सकता है इन सब आकाश गंगाओं का प्रकट होना । उन दो महान आकृतियों का विस्फोट इतना जबरदस्त था कि वो दोनों भाग आपस में टकराकर छिन्न-भिन्न हो गए। उनके छर्रे उड़ गए और उनके आपस में टकराने की घर्षण से (+) अधिक (-) कम जैसे चुंबकीय ऊर्जा की उत्पत्ति होने लगी । ये भाग आपस में जितने संबंधित होते रहते हैं, उतनी ही तेजी से अणु प्रसार होते रहते हैं और उतना ही दमदार उनसे गुरुत्वाकर्षण का भाव होते रहता है। ये अणु जितनी गति से तैयार होते हैं, उतनी ही तीव्र गति से आपस में मिलने की होड़ में दोड़ते रहते हैं। परिणामस्वरूप इसी से शुरू हो जाती है गति और यह गति तब तक चलती रहेगी जब तक घर्षण से अणुओं का तैयार होना निरंतर चलता रहेगा जैसे-जैसे उन भव्य भागों का अंतरंग घर्षण कम होता जाएगा तब गुरुत्वाकर्षण का चक्र भी कम होने लगेगा और सारी आकाश गंगाओं का कार्यचक्र धीमा हाने लगेगा। परिणामस्वरूप हर एक आकाश गंगा में तैनात हजारों तारे अपने-अपने यहाँ उपग्रहों के साथ अपना विस्तार कम करते-करते वापस अपनी आकाश गंगा में विलीन होने लगेंगे और उन सारी आकाश गंगाओं की वापसी या तो उन जलते हुए प्रभागों की राख में समा जाएगी या कहीं दूर फेंक दी जाएगी । घर्षण से निकले चुंबकीय तरंगों के समाप्त होने के कारण आकाश गंगाएं अपने तारों ग्रहों तथा अन्य घटकों के साथ निर्जीव, शांत बनकर खो जाएगी और तब यह ब्रम्हाण्ड फिर एक बार निर्जीव बन सकता है ।

     ब्रम्हाण्ड में घर्षण से उत्पन्न हुई ऊर्जा का जलकर अंत होने तक एक महत्वपूर्ण घटक इस ब्रम्हाण्ड में तैनात कार्यप्रणाली की सहायता कर पूरे ब्रम्हाण्ड को अपने दायरे में रखने में सहायक है "प्राणवायु" । यह वायु जब जब उन दो जड़ आकृतियों का टकराव हो गया तब किसी एक आकृति के आवरण तथा कक्षा में भौजूद रहा होगा, जो अब दो भव्य आकृतियों को आपस में समाने की निरंतर मदद करता रहता है। यह वायु अपने वजन में सघन होने के कारण जहा घर्षण हो रहा है उस भाग के निकट ही रहता होगा। यह वायु ही ब्रम्हाण्ड में स्थित संपूर्ण आकाश गंगाओं, तारों से लेकर ग्रह, उपग्रह तथा अन्य घटक आदि सब में गुरुत्वकर्षण के माध्यम से स्थिर गति रखने में मदद करता है। अगर यह प्राणवायु उन दाे जड़ आकृतियों में तीसरा अपना योगदान समाने में मदद नहीं करता तो यह चुंबकीय रचना नहीं रच पाती और यह जो जीव सृष्टि हमें मिली है उसकी रचना संभव नहीं हो पाती। क्योंकि जब-जब यह वायु जिस किसी तरल, घन तथा अन्य घटकों में समाई गई है वहीं से एक नए पदार्थ का उदगम हुआ है, उदाहर्ण जैसे यह सघन प्राणवायु तरल वायु में समाकर जीस पदार्थ में परिवर्तित होता है तब उस पदार्थ को पानी कहा जाता है । और यही पानी जीवन रचना का कारण माना गया है। परन्तु यह बात कहीं हद तक सच हो सकती है मगर पूरा सच तो यह प्राणवायु है, जिसने जब किसी घटक को राख बना डाला वहीं से नई उत्पत्ति का स्त्रोत बना दिया है ।

       जहां प्राणवायु है वहीं से घर्षण से निकली ऊर्जा का विस्तार है अर्थात जलते हुए दीपक को ढका जाए तो वह तुरंत बुझता नहीं है। वह तब तक जलता रहता है ,जब तक उसे प्राणवायु का सहारा मिलता है। वह दीपक मात्र प्राणवायु के अभाव में बुझ जाता है लेकिन उस दीपक में पर्याप्त इंधन शेष रहता है। कहीं अगर वह इंथन पसर गया तब वहां ज्यादा आग बढ़ती है। कारण वहां प्राणवायु उस इंधन को जलाने दौड़ी चली आती है और यही इस प्रचंड ब्रम्हाण्ड में निरंतर जारी रहता है।अर्थात घर्षण के साथ उसे आपस में समाने प्राणवायु ही उपयुक्त ठहरती है, अन्य कोई वायु नहीं ।

     अब हम इस धरती पर जीवन चक्र की शुरुआत कैसे हुई इस पर नजर डालने की कोशिश करते है। वास्तव में इस धरा पर बहुतांश सजीव जीवन नर-नारी के दो अंगों से बटे हुए हैं। नर-नारी के ये दोनों अंग उस महान ब्रम्हाण्ड में घर्षण होने वाले दो जड आकृतियों से प्रेरित है । पेड़-पौधे से लेकर छोटे-बड़े प्राणी मात्र ही नहीं, कीट-पतंगों में भी नर-नारी के दो विभाजित अंग अपनी-अपनी कार्य प्रणाली में मजबूत है ,तो कहीं एक ही अंग में दोनों नर-नारी के अंश मौजूद रहते हैं। उनका सही काल आने पर विभाजित होकर उत्पत्ति तथा प्रजनन की श्रंखला चलती रहती है। कई पेड़-पौधों के हर एक फुल में नर-नारी की कार्यप्रणाली की व्यवस्था बनी है, तो कहीं नर पेड़ और मादा पेड़ के भी प्राकर होते हैं। ऐसे में नारी पेड़ के इर्दगिर्द नर पेड़ के होने से उनकी फल धारणा बन सकती है अन्यथा वह फूल फल धारण किए बीना ही समाप्त हो जाते हैं।

       असल में सजीव में मौजूद ये दो अंग नर-नारी के अस्तित्व में हैं। वह भी उन दो जड़ आकृतियों के टकराने से निकले धातुओं के (+) कण (डी.एन.ए.) श्रंखला और (-) कण (डी.एन.ए.) श्रंखला से ही प्रेरित है । यह (डी.एन.ए.) श्रंखला इस भूमि पर जिन-जिन परिस्थितियों के साथ जुड़ गया वहां पर मौजूद प्राणवायु ने उनमें जुड़ने का कार्य जारी रखा। इसके चलते (+) कण और (-) कण से ऊर्जा का प्रारंभ होता गया । अब (+) कण निरंतर (-) कण की ओर आकर्षित होकर उसमें समाने की होड़ रखता है । वैसे ही (-) कण उस (+) कण को अपने आप में समाने की ताकत रखता है। इनके मिलने का जब सही समय आता है तब प्राणवायु उन जीवों में उत्तेजना बढ़ाकर आपस में मिला देता है । अंततः इसी के परिणामस्वरूप नए जीवन के रूप में हमें प्राप्त होता है वो नया जीवन जो सृष्टि में अवतरित होता है, उसकी (डी.एन.ए.) वंशावली श्रंखला पर उस जीव की बाल्यवस्था, युवावस्था और बुढ़ापे का कालचक्र रचा गया है अर्थात आयु, वजन, आकार एक दायरे के अंतर्गत आ जाते हैं ।

    किसी भी सजीव में जब तक प्राणवायु कार्यरत होकर समाता रहेगा तब तक उस जीव का अंग कार्यरत होता रहेगा। हर जीव का अंग तब तक जीवित रहता है जब तक वह अपनी कोशिकाओं तथा अंग में प्राणवायु को समाने की गुणवत्ता रखता है। जब कोई जीव इसमें सक्षम नहीं रहता है तब उस जीव की मृत्यु हो जाती है । मरणोपरान्त भी प्राणवायु उस निर्जीव अंग में अपना कार्य जारी रखता है और पुरी तरह उसमें घुल मिलकर उसे खाद के रूप में अन्य सजीव वर्ग में समा जाता है। इस तरह जीवन-मृत्यु का कालचक्र चलता ही रहता है। प्रजनन का मुख्य कार्य प्राणवायु के ही प्रावधान से आगे चलता रहता है और नया जीवन इस धरा पर अवतरित होता रहता हैं। यह प्रणाली निरंतर कीटाणु, विषाणु, जंतु, पेड़, पक्षी, प्राणी आदि सजीव की रचना में चलती रहेगी, यही सच है।  

   प्राणवायु एक ऐसी संजीवनी की श्रंखला है जो सृष्टि रचाती है, निरंतर उसकी रक्षा करती है और जब अंत होता है तब उसे अन्य आकार में परिवर्तित करती है अर्थात (G-Generation, O-Operation, D-Distruction) परमेश्वर का मूल रूप यह प्राणवायु है । जो सृष्टि को निरंतर चलाता ही रहेगा । सृष्टि के बदलाव की आवश्यकता पड़ने पर प्राणीमात्र में (DNA) वंशावली श्रंखला में बदलाव होता रहेगा । सजीवों के आकार से लेकर आयु तक का परियोजन बनता जाएगा और इन सबका मापदंड प्राणवायु पर ही निर्भर रहेगा ।    

तो क्यों न हम इस सुंदर वैज्ञानिक युग में प्राणवायु को ही अपना आराध्य परमेश्वर, रचयिता के रूप में स्वीकार करें और विज्ञान को अपना धर्म मानकर हम सब अलग-अलग धर्म, समुदाय में बंटी मानव जाति को एकत्रिक कर अपनी धरा को नश्ल युद्ध, धर्म युद्ध, वर्ण युद्ध, प्रांत युद्ध आदि से मुक्त कर इस सुंदर धरा की रक्षा का कारण बनें ।

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